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बंदूक चली / सभामोहन अवधिया 'स्वर्ण सहोदर'

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बंदूक चली, बंदूक चली!
चल गई सनासन, सन-सन-सन,
चल गई दनादन, दन-दन-दन।
जाने किस पर, किस जगह चली,
बंदूक चली, बंदूक चली!
धड़-धड़ धड़ाम आई आवाज,
मानो कि भरभरा गिरी गाज
गूँजा स्वर घर-घर, गली-गली
बंदूक चली, बंदूक चली!
लड़की भड़की, लड़का भड़का,
दादी का दिल धड़-धड़ धड़का।
सहमी बेचारी रामकली,
बंदूक चली, बंदूक चली!

-साभार: बाल साहित्य समीक्षा, 1980 स्वर्ण सहोदर विशेषांक, सं. ‘राष्ट्रबंधु’