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रुकमिनी जेवनार बनाए / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

रुकमिनी जेवनार<ref>प्रीतिभोज</ref> बनाए, मकसूदन<ref>मधुसूदन, कृष्ण</ref> जेमन<ref>भोजन करने, खाने</ref> आए जी।
सोभित रतन जड़ाओ<ref>जड़ित</ref> कुंडल, मोर मकुट सिर छाजहिं॥1॥
केसर तिलक लिलार<ref>ललाट</ref> सोभित, उर बयजन्तरी<ref>वैजयंती</ref> माल हे।
बाँहे बिजाइठ<ref>बिजौठा, बाँह में पहनने का एक आभूषण</ref> सोबरन बाला, अँगुरी अँगुठी सोहहिं॥2॥
सेयाम रूप मँह पीयर बसतर, चकमक झकझक लागहिं।
कनक कंकन, चरन नेपुर, रूप काहाँ लौं बरनउँ॥3॥
जिनकर रूप सरूप मुनिजन, मनहिं मन नित गावहिं।
झारि बिछौना, लाइ झारी<ref>पानी पिलाने लगा हाथ-मुँह धुलाने के काम में आने वाला एक प्रकार का टोंटीदार बरतन</ref> सब के पाँव धोवावहि॥4॥
कनक, कलसबा, सुन्नर झारी, गिलास दय आगे धरयो।
अंजुल<ref>अंजलि</ref> जोरी विनय करि के, सभें के पाँत बइठावहि॥5॥
कनक थारी में रुचिर ओदन<ref>भात</ref> दाल फरक परोसहिं।
सुन्नर भोजन परसि परसि, घीउ<ref>घी</ref> ऊपर ढरकावहि॥6॥
साग, बैंगन, अलुआ<ref>आलू</ref> मूरी, कटहर, बड़हर परोसहि।
अदरख, अमड़ा, अरु करइला, इमली चटनी लावहिं॥7॥
कदुआ, ककड़ी अउर खीरा, राइ दही रहता<ref>रायता</ref> बनो।
बारा, बजका आउ तिलौरी, हरखि पापर देइ दियो॥8॥
अदउरी, दनउरी आउर मेथौरी, हरखि दही आगे धरयो।
देइ अचमन<ref>आचमन। हाथ-मुँह धुलाना</ref> जल गँगा के, बाद सभे बीरा<ref>बीड़ा</ref> दियो॥9॥
खाइ बीरा हँसि हँसि बोलथि हरि रुकमिनी का चही<ref>क्या चाहिए</ref>
देऊँ परेम परगास हमरा, हाथ जोरि बिनति करी॥10॥

शब्दार्थ
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