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रिहाई / त्रिपुरारि कुमार शर्मा

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चन्द लम्हों में सिमट जाएगी
ये उधार की ज़िन्दगी
जाने कब अलविदा कह देगी
कायनात में भटकती हुई रूह
अपने थरथराते लबों पर
एक गीली-सी प्यास चिपकाए
लोग ढ़ूढ़ते रह जाएंगे
डाली-डाली जिस फूल को
पत्ता-पत्ता मुरझा चुका होगा
और सूखी हुई हर पंखुरी
किस्मत से शिकायत नहीं
बल्कि अज़ल पर नाज़ करेगी
और सर उठा कर कहेगी
कि आज फिर सुनहरी जीस्त
तीरगी की क़ैद से रिहा हुई...
<Poem>
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