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{{KKRachna
|रचनाकार=क़तील शिफ़ाई
}}{{KKVID|v=U36NWf90vuM}}[[Category:गज़ल]]{{KKCatGhazal}}<poem>गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगेगुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे
गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे<br>मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्सगुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे<br><br>
मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स<br>मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशीउस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे<br><br>
मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी<br>वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनोंमेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे<br><br>
वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों<br>जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे<br><br> तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"<br>मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे<br><brpoem>
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