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|रचनाकार='सुहैल' अहमद ज़ैदी
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रातों की नींद ख़्वाब का मंज़र भी ले गया
सूरज तो मेरी आँख का जौहर भी ले गया

अम्न-ओ-अमां के नाम पे शमशीर छीन ली
फिर शहर-यार हाथ का पत्थर भी ले गया

पहले भी ये तही था मगर अब के ग़म-गुसार
पैवस्त था जो दिल में वो ख़ंजर भी ले गया

कुछ कम न थी लहू की चमक आब-ए-तेग़ से
इक ज़ख़्म अपने दिल पे सितम-गर भी ले गया

छूटा ख़रीदने से मैं दस्तार बार बार
अब के हवा का ज़ोर मेरा सर भी ले गया
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