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{{KKAarti|रचनाकार=KKDharmikRachna}}{{KKCatArti}}<poem> ॐ जय श्री राणी सती माता , मैया जय राणी सती माता , अपने भक्त जनन की दूर करन विपत्ती || विपत्ती॥अवनि अननंतर ज्योति अखंडीत , मंडितचहुँक कुंभा दुर्जन दलन खडग की विद्युतसम प्रतिभा || प्रतिभा॥मरकत मणि मंदिर अतिमंजुल , शोभा लखि न पडे, ललित ध्वजा चहुँ ओरे , कंचन कलश धरे || धरे॥घंटा घनन घडावल बाजे , शंख मृदुग घूरे, किन्नर गायन करते वेद ध्वनि उचरे || उचरे॥सप्त मात्रिका करे आरती , सुरगण ध्यान धरे, विविध प्रकार के व्यजंन , श्रीफल भेट धरे || धरे॥संकट विकट विदारनि , नाशनि हो कुमति, सेवक जन ह्रदय पटले , मृदूल करन सुमति, अमल कमल दल लोचनी , मोचनी त्रय तापा || तापा॥त्रिलोक चंद्र मैया तेरी ,शरण गहुँ माता || माता॥या मैया जी की आरती, प्रतिदिन जो कोई गाता, सदन सिद्ध नव निध फल , मनवांछित पावे
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