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जो कह न सकूँ मैं तुमसेआज अचानक मुझे आ गयी, उसको चित्रित कर दोगे?अपनी प्रिय माता की याद।ओ चित्रकार क्या मुझकोनिकल पड़े मेरी आँखों से, ऐसी छवि दिखला दोगे?अविरल आँसू उसके बाद॥चिर वियोगिनी है आतीमानो कोई यह कहता हो, पथ पर मोती बरसाती।अब न मिलेगी प्यारी माता।तारों के दीप जलातीइसीलिए तो आज मुझे अब, और नहीं है कुछ रोती कुछ-कुछ गाती॥उसके भीगे गालों को, तुम भी क्या देख सकोगे?ओ चित्रकार, क्या मुझको, ऐसी छवि दिखला दोगे?भाता॥
निर्जनता होवे मग मेंवह होती इस समय यहाँ, बाला हो अस्थिर चंचल।तो करती मेरा बहुत दुलार।हो तेज़ हृदय की धड़कनमैं थी उसकी सुता लाड़िली, हिलता हो जिससे अंचल॥हाय लुट गया मेरा प्यार॥करुणा की उस चितवन कोमैया! जब से होश सँभाला, पद पर अंकित कर दोगे?देख नहीं मैं पायी तुझको।ओ चित्रकार, क्या मुझकोमन में उठता प्रश्न यही है, ऐसी छवि दिखला दोगे?छोड़ दिया क्यों तूने मुझको॥
तारों की ज्योति मलिन होसुनती हूँ जब शब्द किसी के, प्राचाी नभ उज्ज्वल तर हो।मुख से मैं मेरी प्रिय माता।ऊषा सिन्दूर लगाती हो प्रात मधुर सुखकर हो॥इस शान्त दृश्य प्यारी माता कहने को पावन, कैसे बन्दी कर लोगे?हा! मेरा भी है जी ललचाता॥ओ चित्रकारक्या अपराध किया था मैंने, त्याग दिया जो तूने मुझको।सोच तनिक तो अपने मेन में; यही उचित क्या मुझकोथा माँ, ऐसी छवि दिखला दोगे?तुझको॥
भोले-भाले से आँसूत्याग किया जब मेरा तूने, तारों की होड़ लगाते।तनिक न आया था क्या ख्याल।अपनी उस उज्ज्वलता काहाय, भी दर्शन करवा जाते॥सोच क्यों लिया न मन में, होवेगा क्या इसका हाल॥उसके रहस्यमय जीवन यद्यपि पितृ-पदों कामुझको, भेद मुझे कह दोगे?मिला यथोचित शुद्ध सनेह।बिना मातृ ममता के वह भी, उतना नहीं मोद का गेह॥
फिर बहुत दूर पर धँधली-सीमन में सोचो, छाया एक दिखाना।मुझे छोड़कर, हाथ तुम्हारे क्या आया।वे प्रिय आते ही होंगेजननी होकर, ऐसा कुछ भाव बनाना॥जनकर मुझको, क्यों नाहक ही तलफाया॥उन बड़ी-बड़ी आँखों सेमाता होती तो क्या होता, आँसू भी ढलका दोगे?यह अभिलाषा रहती है।ओ चित्रकारमन कहता है, क्या मुझकोवृथा हाय! क्यों, ऐसी छवि दिखला दोगे?इस प्रकार दुख सहती है॥
बस अन्तिम दृश्य बनानाहा! हा! कितने प्यारे बच्चे, दोनों का मिलन दिखाना।मातृ-स्नेह से वंचित होंगे।उनकी मीठी सिसकी होंगे जो अज्ञात उन्हें तो, दुख ही सारे संचित होंगे॥जिनको होगा ज्ञान ज़रा भी, पाते क्लेश दुखी वे होंगे।करते होंगे याद निरंतर, समझ-समझकर रोते होंगे॥ यद्यपि ‘मा’ के सुख सेवंचित, तुम कभी सिसक मत जाना॥और न माता का है ध्यान।क्या सचमुच ऐसा सुन्दरतो भी यही लालसा मन में वारूँ उस पर तन मन प्रान॥नहीं तुम्हें मैंने देखा है, वह देखा चित्र पूर्ण कर दोगे?तुम्हारा है। ओ चित्रकारइसी लिए तो आज बह रही, क्या मुझकोसतत स्नेह की धारा है॥ मन में उमड़े स्रोत प्रेम का, कभी न मुख से प्रकट कहे।प्रेम उसी को कहते हैं जो, बसे दूर या निकट रहे॥जो कुछ अनुचित बातें कह दीं, उन्हें ध्यान में मत लाना।कभी-कभी हे अंव! स्वप्न में, ऐसी छवि दिखला दोगे?अपने दर्शन दे जारा॥
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