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इल्तिजा कर रहा हूँ मैं तुमसे यही, नंगे पाँवों गली में न आया करो
बच के काँटों से रक्खा करो तुम क़दम, पैर नाज़ुक है उसको बचाया करो
घर से श्रिंगार करके निकलती तो हो, हाँ मगर इतनी सी इल्तिजा है मेरी
गाल पर एक तिल सा बनाया करो, जब भी नैनो में काजल लगाया करो
 
तुमने मुझको लिखा था जो ख़त प्यार का, जो भी उसमें लिखा था वो अच्छा लगा
यूँ न नैनो से निंदिया चुराया करो, आ के सपनों में मुझको सताया करो
 
घर की अंगनाई में या के तन्हाई में, जब तुम्हें याद मेरी सताने लगे
भूलकर दूरियां मन ही मन जानेमन, फूल की तरह तुम मुस्कराया करो
याद करके तुम्हें गीत लिखता हूँ मैं, मेरा हर गीत है बस तुम्हारे लिए
प्यार करता हूँ तुमसे ख़ुदा की क़सम, प्यार की राह में हैं बड़े पेचो-ख़म
है 'रक़ीबे'-जहाँ की यही इल्तिजा, जो भी वादा करो वो निभाया करो  
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