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Kavita Kosh से
गीत बेचता हूँ ;
मैं सभी क़िसिम-क़िसिम के गीत
बेचता हूँ ।
यह गीत सुबह का है, जा गा कर देखें,
यह गीत ग़ज़ब का है, ढा कर देखे;
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है
यह गीत बढ़ाये से बढ़ जाता है; यह गीत से बढ जाता है
यह गीत भूख और प्यास भगाता है
जी, यह मसान में भूत भूख जगाता है;
यह गीत भुवाली की है हवा हुज़ूर
जी, और गीत भी हैं, दिखालाता दिखलाता हूँ
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ ;
जी, छंद और वेबे-छंद पसंद करें –
जी, अमर गीत और वे जो तुरत मरें ।
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं पा पास रखे हूँ क़लम और दावात
इनमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ ?
या भीतर जा कर पूछ आइये, आप ।
है गीत बेचना वैसे बिलकु बिलकुल पाप
क्या करूँ मगर लाचार हार कर