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Kavita Kosh से
|रचनाकार=भूषण
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पौन वारिवाह बारिबाह पर, शम्भु संभु रतिनाह पर, ज्यों सहस्त्रबाहु ज्यौं सहस्रबाह पर राम -द्विजराज हैहैं॥
दावा द्रुम दण्ड दंड पर, गरुड़ वितुण्ड चीता मृगझुंड पर, मृगन के झुण्ड 'भूषन वितुंड पर , जैसे मृगराज हैहैं।
तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कन्स कंस पर, तेज तम अन्स त्यौं मलिच्छ बंस पर, त्यों मलेच्छ वन्स पर सेर शिवराज हैं॥ ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं। कंद मूल भोग करैं, कंद मूल भोग करैं,तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं॥ भूषन शिथिल अंग, भूषन शिथिल अंग,बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं। 'भूषन भनत सिवराज है”बीर तेरे त्रास,नगन जडातीं ते वे नगन जडाती हैं॥ छूटत कमान और तीर गोली बानन के,मुसकिल होति मुरचान की ओट मैं। ताही समय सिवराज हुकुम कै हल्ला कियो,दावा बांधि परा हल्ला बीर भट जोट मैं॥ 'भूषन' भनत तेरी हिम्मति कहां लौं कहौंकिम्मति इहां लगि है जाकी भट झोट मैं। ताव दै दै मूंछन, कंगूरन पै पांव दै दै,अरि मुख घाव दै-दै, कूदि परैं कोट मैं॥ बेद राखे बिदित, पुरान राखे सारयुत,रामनाम राख्यो अति रसना सुघर मैं। हिंदुन की चोटी, रोटी राखी हैं सिपाहिन की,कांधे मैं जनेऊ राख्यो, माला राखी गर मैं॥ मीडि राखे मुगल, मरोडि राखे पातसाह,बैरी पीसि राखे, बरदान राख्यो कर मैं। राजन की हद्द राखी, तेग-बल सिवराज,देव राखे देवल, स्वधर्म राख्यो घर मैं॥