भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
Changes
Kavita Kosh से
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ<ref> रोने-धोने की जगहें</ref>और भी हैं
तू शाहीं<ref>शाहीनगरुड़ ,गिद्ध उक़ाब</ref>है परवाज़<ref> उड़नाउड़ान भरना</ref>है काम तेरा
तेरे सामने आसमाँ और भी हैं