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<Poem>
पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से
बड़ी संडासी में
पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड
जकड़कर .
माँ धौंक रही
हवा से फुलाकर
धौंकनी लगातार.
भट्टी तप रही .
दुपहरी भी तप रही .
तप रहे हम दोनों.
मैं और तुम
मेरे हाथ में भी
उतना ही भारी घन.
पिता ने भरी हुंकारी.
क्रम से ,
दुगुने दम से.
तुम्हारी आँखें मेरी आँखों में ,
मेरी भी
तुम्हारी भी .
एक गोले में घिरे हम.
तुम्हें उकसाते हुए,
मुझे शाबासी देते हुए.
घन बिजली की तरह चले.
पसीना चू पड़ा तुम्हारी झबरी मूँछों से.
तरबतर हो गई मेरी छींट की कोरी अँगिया.
ढल गया लोहा.
पिता ने डाल दिया पानी में
बुझने को.
चिहुँक उठा सारा कबीला .
मेरे बल से टकराकर
हो गया दुगुना.
पंचों ने हमारी शादी तय कर दी है !
लोहा एक बार फिर
मेरी नज़रों में ,
तेरी निगाहों में.
सच में तू मेरी जोट का है !
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