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सिक्के / लक्ष्मीकान्त मुकुल

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हमारे जन्म से बहुत पहले ही
केंचुल की तरह छुट गयीं मुद्रायें
चित्ती-कौड़ी-दाम-छदाम
अंगूठा, ढेंगुचा, सवैया, अढईया के पहाड़े
कोकडऊर बुकवा, माठ, गाजा, कसार
सरीखी देसी मिठाइयाँ
अमेरिका ने नहीं, शहरी बन चुके लोगों ने
घोल दिए हैं हमारी इच्छाओं के कुएं में नमक

छुटपन के साथी थे पांच-दस पैसे के सिक्के
जिससे खरीदते थे मेले में गुड की रस भरी जिलेबियां
हमारे गुल्लक भर जाते थे चवन्नी-अठन्नी से
पंद्रह के पोस्टकार्ड पर दूर से आते थे सन्देश
जिसकी आहट से भर जाती थी खुशियों की झोली
प्रेमचंद्र का कथानायक हामिद तो तिन पैसे में ही
खरीद लाया था दादी के लिए चिमटा

किसने छीने सिक्के, वे गुब्बारे, वे गुल्लक ......
तुम्हें दिखा नहीं हज़ार पंसौवा बदलने वालों को
चीटियों से लगी थीं कतारें
देखना कभी एक-दो सिक्के भी
हो जायेंगे चलन से बाहर
सूखे रेत पर पड़े केकड़े की तरह
असहाय, उपेक्षित, बेबस