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हँसते थे मेरे हाल को जो यार देख कर / मिर्ज़ा मोहम्मद तकी 'हवस'

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हँसते थे मेरे हाल को जो यार देख कर
उन सब ने रो दिया मुझे बीमार देख कर

सब हम-सफीर छोड़ के तनहा चले गए
कुंज-ए-क़फ़स में मुझ को गिरफ़्तार देख कर

क्या जाने क्या ग़ज़ब है ये जादू भरी निगाह
ग़श कर गया हूँ मैं जिसे यक बार देख कर

ख़ून-ए-जिगर के साथ कहीं चला न जाए
रोना ज़रा तू दीदा-ए-खूंबार देख कर

अपने ‘हवस’ पे जब से के तू मेहर-बाँ हुआ
जलते हैं रात दिन उसे अग़्यार देख कर