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हाँ, लेटा हूँ मैं धरती पर / ओसिप मंदेलश्ताम

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हाँ, लेटा हूँ मैं
धरती पर<ref>वलेरी ब्रूसव की कविता पंक्ति ‘‘मैं धरती पर लेटा हूँ और मेरा सपना है धुँधला’’ को याद करके लिखी गई कविता।</ref>
होंठ फड़फड़ाता हुआ
पर जो कुछ भी मैं कहूँगा
याद कर लेगा हर स्कूली छात्र
लाल चौक पर धरती
पूरी तरह गोल है
और धरती को रोलर से
सख्त बना रहा है स्वयंसेवक<ref>यहाँ तात्पर्य स्तालिन से है।</ref>

पूरी तरह गोल है
धरती लाल चौक पर
पर उसकी गोलाई
बँटी हुई है
पता नहीं क्यों फाँकों में
खुद को
नीचे पटक कर
वहाँ चावल के खेतों में
धरती पर कहीं
जीवित है
इस दुनिया का अंतिम दास

मई 1935
 

शब्दार्थ
<references/>