भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अंग दर्पण / भाग 9 / रसलीन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मुख चीर-वर्णन

इहिं बिधि गोरे बदन पर लसत डोरिया सेत।
ज्यौं लहरीलों सरद घन ससि पर सोभा देत॥92॥

रंग लहरिया चीर में गोरे मुख को देख।
मानों कला असेष ससि बैठो है परवेख॥93॥

किनारी-वर्णन

सुकिनारी सारी चितै सबन बिचारी बात।
गात रूप पर बाल के जातरूप बलि जात॥94॥

ग्रीवा-वर्णन

जब धरती ख कपोत सब नटे देखि ग्रिव भेख।
तब उन पापिन कंठ बिधि दियो पाप की रेख॥95॥

दर्पन से वा कण्ठ सम कंचन दुति कित होत।
दुलरी जाके लगत ही जगत चौलरी होत॥96॥

कंठत्रयरेख-वर्णन

जब मोहे तिहुलोक सब तिहूँ ग्राम लै ठीक।
तब दीने तुव कंठ बिधि ये त्रय मोहन लीक॥97॥

कंबु कंठपर धरत यों कनक चोलरी जोति।
चतुर भाल जनु दीप की डगमग डगमग होति॥98॥

चंपकला मोतिन जड़ित तरे ढरे बहुगूद।
सहस किरन रवि ते मनो चुवन सुधा की बूंद॥99॥

चौकी-वर्णन

लाल चुनी में हरित नग यांे उरबसी सोहाय।
मानों चंद्रबधून में इंद्रपुत्र दरसाय॥100॥

हार-वर्णन

अदभुत मय सब जगत यह अदभुत जुगति निहार।
हार बाल गर परत ही परयो लाल गर हार॥101॥

हार सितासिन नगन के लखि मन पायो ऐन।
परयो मैन के चैन ते गरे इन्द्र के नैन॥102॥