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अंधे सपनों का आश्वासन / सुनो तथागत / कुमार रवींद्र

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हम उदास हैं
और नदी में आग लगी है
कैसा है दिन
 
अंधे सपनों का आश्वासन
हमें मिला है
नदी-किनारे फिर
ज़हरीला फूल खिला है
 
दिन-भर सोई
आँख बावरी रात जगी है
कैसा है दिन
 
छली हवाओं ने
जंगल में पतझर बाँटे
सीने में चुभ रहे
सैकड़ों पिछले काँटे
 
बस्ती-बस्ती
शाहों की चल रही ठगी है
कैसा है दिन
 
आदमक़द कारों से निकले
चौपट बौने
सहमे घूम रहे हैं
जंगल में मृगछौने
 
धुनें पराई
हम सबको लग रहीं सगी हैं
कैसा है दिन