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अपनी मंज़िल का पता सबसे पूछते आये / डी. एम. मिश्र
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अपनी मंज़िल का पता सबसे पूछते आये
रास्ते में हमारे और रास्ते आये
रात दिन बस यही सवाल कौंधता मन में
कौन अपना है इधर किसके वास्ते आये
मन में बैठा गुबार अब सहा नहीं जाता
अपने हाथों से अपने सर को पीटते आये
बात बन जाय नज़र मिलते ही उनसे मेरी
रास्ते भर यही तरकीब ढूँढते आये
हम तो समझे थे कि बरसात होगी जम के आज
मेघ खाली ही वो निकले जो गरजते आये
बस यही सोच के सब कुछ यहीं रह जायेगा
जो भी झोली में था रस्ते में बाँटते आये
ऐ खुदा देर जो होने लगी तो क्या करते
तेरे घर का पता लोगों से पूछते आये