आईना छलने लगा है / यतींद्रनाथ राही

मीत!
मत दो तुम मुझे
सौ साल जीने की दुआएँ
हर कदम अब तो मुझे यह
आखरी लगने लगा है।
सत्य है यह
जूझना ही तो
मेरी फितरत रही है
धार के विपरीत वाली
राह ही मैंने गही है
लक्ष्य साधा है
नहीं देखी कभी पथ की जटिलता
कब कहाँ कितनी सहजता
या मिली कितनी कुटिलता
पर कभी
अब एक काँटा सा
कहीं चुभने लगा है।
पर्वतों न बाँह थामी
दर्द बाँटा पथ सँवारे
मरुथलों की मृगतृषा ने
तृप्ति के छौने दुलारे
सिन्धु की उत्ताल लहरें
व्योम की निस्सीमताएँ
अगयीं मुझमें सिमटकर
सृष्टि की रमणीयताएँ
क्या कहें अब अनखिला ही
हर सुमन
झरने लगा है।
विकृता है मानसिकता
कलुश-मण्डित आत्माएँ
आवरण की भव्यता में
ध्वस्त होती आस्थाएँ
अब
न मन्दिर हैं
न पूजा है
न कोई अर्चना है
नेह, श्रद्धा, प्राण-अर्पण
ढोंग,
केवल वंचना है
क्या करूँ
अब आइना
मेरा
मुझे छलने लगा है।

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