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आनेवाली सदी की प्रतीक्षा में / प्रताप सहगल

इन बच्चों की आंखों में
बीसवीं शताब्दी का कोढ़ है
शताब्दी का कोढ़
लावा बनकर फैल रहा है
लावा जला रहा है
रेत में उगाए हुए
आदर्शों के जंगल।

इन बच्चों के कन्धों पर
हमारा इतिहास है
इन कन्धों पर
लटके हुए हैं हमारे मुखौटे
इन्हीं मुखौटों से झांककर
हम देखते हैं इतिहास।
यह सदी करवट लेगी
आएगी इक्कीसवीं सदी
हमारा नेता कहता है।

आने वाली सदी है
आएगी
नेता चाहे न चाहे
आएगी ज़रूर आने वाली सदी
पर मैं पूछता हूं
क्या आने वाली सदी भी
इन्हीं कन्धों पर
सवार होगी
हमारे इतिहास की तरह
और वह भी
इन आंखों से उगलता लावा
खामोशी से
पी जाएगी।