भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

इधर भी तो देखो / मुकेश निर्विकार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सैसेक्स
जी.डी.पी.
डेवलपमेंट
आदि-आदि का
दिन-रात
हो-हल्ला मचाने वालों,
सुनो!

ऊँची-ऊँची इमारतों,
बहू मंज़िला, फ्लेटो,
हाई-वे व एक्सप्रेस वे,
चमाचम कारों तथा
चकाचोंध बाज़ारों
से जरा अपनी नजर हटाकर
इधर भी तो देखो-


वहाँ,
हाँ वहाँ,
सामने
‘बुद्धन की खोली में
किशोरवय उसकी ‘मुनिया’
रजस्वला है आज
मगर,
झोंपड़ी में उसके/कोई
फालतू
‘लत्ता’ नहीं है!