एक-एक पल बना युगों-सा दारुण पीड़ाका आगार।
आँखोंमें छायी वर्षा ऋतु, अविरत बही अश्रु-जल-धार॥
हुआ व्यथामय हृदय, कर उठे प्राण करुण-स्वर हाहाकार।
प्रियतम-विरह विषमसे सूना हुआ सहज सारा संसार॥
एक-एक पल बना युगों-सा दारुण पीड़ाका आगार।
आँखोंमें छायी वर्षा ऋतु, अविरत बही अश्रु-जल-धार॥
हुआ व्यथामय हृदय, कर उठे प्राण करुण-स्वर हाहाकार।
प्रियतम-विरह विषमसे सूना हुआ सहज सारा संसार॥