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ऐसे अंदाज़ से अक्सर नज़र आता है मुझे / मेहर गेरा

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ऐसे अंदाज़ से अक्सर नज़र आता है मुझे
एक तस्वीर नई रोज़ दिखाता है मुझे

मैं तो हूँ बर्गे-खिज़ा पेड़ से बिछड़ा हूँ अभी
वो है इक झोंका हवा का जो उड़ाता है मुझे

इतना शहजोर नहीं हूँ कि उसे रोक सकूँ
वक़्त का धारा तभी साथ बहाता है मुझे

दूर तक कोई दिखाई नहीं देता फिर भी
कौन देता है सदा, कौन बुलाता है मुझे

हिज्र की रुत में शबो-रोज़ बदलकर मेरे
वक़्त अब देखिये क्या रंग दिखाता है मुझे।