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ऐ दिल तू इबादत के लिये जायेगा किधर / कबीर शुक्ला

ऐ दिल! तू इबादत के लिए जाएगा किधर।
लोग कहते हैं ये मंदिर ये मस्जिद की डगर।
 
इस कदर अंधा है इंसाँ यहाँ क्यूँ मेरे मौला,
बाँट डाला है ख़ुदी में उस खुदा का ही घर।
 
हाय रे इंसान और हाय क्या तेरी समझ है,
बाँट डाला रंगों को भी मजहब के नाम पर,
 
कपड़े पग टीका पहचान बने इंसान की,
धरम के नाम पर ही पहचाने जाते हैं शहर।
 
उम्र गुजरती है जहाँ में प्यार की जुस्तजू में,
प्यार था देना जिनको उसने बरपाया कहर।
 
ना बनाना किसी जाति धरम का मुझको,
फिर बनाना मुझे इंसाँ इस जहाँ में अगर।
 
बस्तियाँ सहमी हुई चमन फूटकर रोता है,
 'कबीर' कर ले तू इबादत पहर दो पहर।