भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

कभी-कभी / प्रेमशंकर रघुवंशी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बाग-बगीचों की फूलों की
नित चर्चा करने वालो
कभी-कभी तो वनफूलों की
ख़ुशबू पर बातें कर लो !

ये हैं ऐसे फूल कि जिनके
माली ये ख़ुद ही होते
ये न कभी मौसम की नरमी
गरमी से विचलित होते

ये हैं ऐसे फूल कि हरदम
वन की गोदी में खिलते
ये हैं ऐसे फूल कि हरदम
अपने पानी पर पलते

बाग़-बग़ीचों की क्यारी पर
नित विचार करने वालो
कभी-कभी तो वनफूलों की
सर्जन पर बातें कर लो !!

जिन फूलों पर मोहित हो तुम
वे क़लमों पर अवलंबित
परजीवी वे पर‍आश्रित हैं
गैर जड़ों से संचालित

अनुभव निजी न कोई उनके
ना जीवन्के संवेदन
द्वंद्व न कोई उनके अंदर
ना ही कोई उद्वेलन

बाग़-बग़ीचों की सौरभ का
नित प्रचार करने वालो
कभी-कभी तो वनफूलों के
कामों का सुमरन कर लो !!