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कहौ सो बिपिन हैं धौं केतिक दूरि।/ तुलसीदास
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कहौ सो बिपिन है धौं केतिक दूरि |
जहाँ गवन कियो, कुँवर कोसलपति, बूझति सिय पिय पतिहि बिसूरि ||
प्राननाथ परदेस पयादेहि चले सुख सकल तजे तृन तूरि |
करौं बयारि, बिलम्बिय बिटपतर, झारौं हौं चरन-सरोरुह-धूरि ||
तुलसिदास प्रभु प्रियाबचन सुनि नीरजनयन नीर आए पूरि |
कानन कहाँ अबहिं सुनु सुन्दरि, रघुपति फिरि चितए हित भूरि ||