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कुछ गुमाँ भी है कुछ यक़ीं भी है / सिया सचदेव

कुछ गुमाँ भी है कुछ यक़ीं भी है
मेरे पैरोँ तले ज़मीं भी है

वहशत ए दिल का क्या करूँ मैं
ईलाज पास है और वो नहीं भी है

जा बजा उसको ढूढ़ती हूँ मैं
और मेरे दिल में वो मक़ीं भी है

ज़िंदगी तेरा ऐतबार नहीं
मौत पर तो मुझे यक़ी भी है

ये तो अच्छा नहीं तरीक़ा भी
हाँ भी करते हो और नहीं भी है

मैं पुजारन हूँ वो है रब मेरा
ढूँढ लूँगी जहाँ कहीं भी है

क्यों ख़फ़ा रहती है सिया ख़ुद से
देख दुनिया बड़ी हसीं भी है