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खड़ा यह कौन कुंजके द्वार / हनुमानप्रसाद पोद्दार

खड़ा यह कौन कुंजके द्वार ?
देखो ललिते! अरी विसाखे! करो न तनिक अबार॥
है घनश्याम वारिधर ? है या गिरधर स्याम सुजान
उमड़ा घन नूतन ? या आये घर मोहन रस-खान॥
नव-जलधर में इंद्रधनुष है ? या है सिर सिखि-पक्ष।
बक-पाँती उड़ रही ? हिल रही मुक्त-माल या वक्ष॥
घन-तन-पर बिजली है ? या है मोहन-तन पट पीत।
मंद मेघ-गर्जन है ? या है प्रियका मुरली-गीत॥
सजनी! जा‌ओ तुरत, बता‌ओ आ मुझको सब बात।
हँस बोलीं-’सखि! माधोसे मिल करो सुसीतल गात’॥