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ख़्वाबों की भीड़ से कई सालों से दूर हूँ / सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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ख़्वाबों की भीड़ से कई सालों से दूर हूँ ।
फूलों पे चल रहा हूँ मैं, छालों से दूर हूँ ।

पढ़ लेगा तेरा नाम कोई मेरी शक्ल से,
मुद्दत से इसलिए मैं उजालों से दूर हूँ ।

जब तू नहीं था साथ मेरे ये थे सब मगर,
मैं अब तसव्वुरों से, ख़यालों से दूर हूँ ।

कल तक भी मुझे दूर से ही पूछते रहे,
मैं आज भी दुनिया के सवालों से दूर हूँ ।

अच्छा हुआ कि कोई मेरा घर ना बन सका,
दरवाज़ों, कुन्दियों से मैं तालों से दूर हूँ ।

जब से लिखा है ख़ुद पे तेरा नाम और पता,
मैं इनके, उनके, सबके हवालों से दूर हूँ ।

ऐसा क़माल कर दिया तेरे क़माल ने,
सारे तिलिस्म, जादू, क़मालों से दूर हूँ ।