खुलने लगे हैं दूर उफ़ुक़ पर किवाड़ से / पुष्पराज यादव
खुलने लगे हैं दूर उफ़ुक़ पर किवाड़ से
निकला है चाँद आज दरख़्तों की आड़ से
आवाज़ आ रही थी कि पस्ती की सम्त देख
मैं सुन के मुस्कुरा दिया ऊँचे पहाड़ से
ये मौसम-ए-खिजाँ है कि अफ्सुर्दगी-ए-हुस्न
पीली-सी पड़ गईं हैं बहारें लताड़ से
मैं चाहता हूँ वक़्त से आगे की रह भी हो
एक गुमशुदा सफ़र हो अलग भीड़-भाड़ से
वहशत ने तोड़ रक्खा है ऐ दोस्त क्या करूं
वरना मैं पस्त होता क्या धोबी पछाड़ से
दिल का सफ़र तमाम हुआ आरज़ू की भी
पड़ताल कर रहा हूँ अभी चीर-फाड़ से
इक शख़्स पासबान-ए-मुहब्बत था मर गया
इक दर्द झाँकता है अभी झाड़-झाड़ से
चलता कहाँ है काम हमारा भी तेरे बिन
बस ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं जुगाड़ से
मैं और मेरे साथ ये खाना-खराबियाँ
जैसे किसी को इश्क़ हुआ हो उजाड़ से