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गही जब बाँहीँ तब करी तुम नाँहीँ / अज्ञात कवि (रीतिकाल)

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गही जब बाँहीँ तब करी तुम नाँहीँ ,
पाँव धरी पलकाहीँ नाँहीँ नाँहीँ के सुभाई हौ ।
चुँबन मे नाँहीँ औ अलिँगन मे नाँहीँ ,
परिरँभन मे नाँहीँ नाँहीँ नाँहीँ अवगाही हौ ।
बोलन मे नाँहीँ पट खोलन मे नाँहीँ ,
सब हास के बिलासन मे नाँहीँ ठीक ठाई हौ ।
मेलि गलबाँहीँ केलि कीन्ह्यो चित चाही ,
अरे हाँ ते भली नाँहीँ या कहाँ ते सीख आई हौ ।


रीतिकाल के किन्हीं अज्ञात कवि का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।