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आइ सचिव बिभीषनके कही |
कृपासिन्धु !दसकन्धबन्धु लघु चरन-सरन आयो सही ||
बिषम बिषाद-बारिनिधि बूड़त थाह कपीस-कथा लही |
गये दुख-दोष देखि पदपङ्कज, अब न साध एकौ रही ||
सिथिल-सनेह सराहत नख-सिख नीक निकाई निरबही |
तुलसी मुदित दूत भयो, मानहु अमिय-लाहु माँगत मही ||