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कहो, क्यों न बिभीषनकी बनै ?
गयो छाड़ि छल सरन रामकी, जो फल चारि चार्यौं जनै ||
मङ्गलमूल प्रनाम जासु जग, मूल अमङ्गलके खनै |
तेहि रघुनाथ हाथ माथे दियो, को ताकी महिमा भनै ?||
नाम-प्रताप पतितपावन किए, जे न अघाने अघ अनै |
कोउ उलटो, कोउ सुधो जपि भए राजहंस बायस-तनै ||
हुतो ललात कृसगात खात खरि, मोद पाइ कोदो-कनै |
सो तुलसी चातक भयो जाचत राम स्यामसुन्दर घनै ||