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गोरी-गोरी रेशम डोरी, शरक फरांसी हो सै / दयाचंद मायना

गोरी-2 रेशम की डोरी, शरक फरांसी हो सै
सुथरी बहू गरीब के घर मैं, मरद नै फांसी हो सै...टेक

मैं सूं जोहड़ लेट का पाणी, तू सै लोटा गंग नीर का
भोली-भोली सूरत तेरी, काम करै सै रफल तीर का
हँसना बुर बीर का, चोर की दुश्मन खाँसी हो सै...

मनैं भगत बोहत से देखे सैं जो काढ़ैं भूत बजाकै डोरू
एक आधे की कहता कोन्या, बोहत फिरै सैं इज्जत चोरू
सच बूझो हीणे की जोरू, सबकी दासी हो सै...

ध्यान लगाकै सुणती जा, एक लेख बताऊँ उदालक का
बुरी गरीबी सबकी बीबी, जिसा नर्म साग पालक का
दूध, दही हो मालिक का, मांगणिया की ल्हासी हो सै...

सासची कहदे बात ‘दयाचन्द’ मुँह तै झूठ कदे ना बोलै
आड़ ओट में छिपा रहै सै, पहाड़ बताया तिल के औल्है
निर्बल पै हांगा तोलै, ठाडे की हाँसी हो सै...