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घर. / मरीना स्विताएवा

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मेरे यौवन के एक दिन जैसा यह घर
स्‍वागत करता है मेरा
जिस तरह स्‍वागत करता है मेरा यौवन
और मिलाने के लिए बढ़ाता है हाथ ।

किसी इशारे की तरह
बरसाती के भीतर छिपने के प्रयास करता है माथा
ठीक जैसे झेंप रहा हो वह
कि वह माथा है और इतना बड़ा ।

मैं यों ही तो नहीं कहती रही --
उठाओ, ले जाओ मेरी ख़ातिर
कभी न सूखनेवाली कीचड़ में
चट्टान की तरह यह माथा ।

नाप डाली अपने माथे से मैने
संग्रहालय के अपोलो की ऊँचाई
दूर, गलियों से कविताओं का पीछा करती मैं
अल्‍डर की टहनियों की तरह तोड़ डालूँगी दिन ।

कुछ भी नहीं बची है आँखों में गरमाहट
जो है वह तो हरापन है शीशों का
जो सैकड़ों बरसों से देखते आ रहे हैं
उजड़ जाना उद्यानों का ।

खिड़की के सो रहे शीशों का
नियम है यह :
मेहमानों का न करना इन्तज़ार
प्रतिबिम्बित न करना पास से गुज़रते चेहरों को ।

झुकी नहीं अपने ज़माने के जुल्‍म के आगे ये आँखे
बनी रही दर्पण अपने आपकी ।
ओ, उदास भौहों के नीचे से झाँकती
मेरे यौवन की हरियाली
हरियाली मेरी आँखों और आँसुओं की…

विराटताओं से घिरा
घर-मात्र अवशेष, घर-अमूल्‍य निधि,
शरमाता हुआ पेड़ों के पीछे से
मेरा घर --
मेरे हृदय का पावन शिशु-चित्र....