अभव-अवधि में विविध भवयिता
प्रकृति जनी कब? महत्-जनयिता;
दिखा सत्य जब बना कवियता;
तू भी बन दर्शन बन।
दिये दृष्टि के लिये विवर्तन;
किये भवन के पट-परिवर्तन;
जिये सृष्टि-अंकुर बहुविध बन;
तू भी बन सर्जन बन।
प्रलय-चरण में बँध जिसका मन
गति का बंधन बना अबंधन ;
वही सर्जन में भी गुंजन-छन;
तू भी बन शिंजन बन।