भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जार्ज़िया के गिरी-टीलों को रात्रि-तिमिर ने घेरा है / अलेक्सान्दर पूश्किन

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: अलेक्सान्दर पूश्किन  » संग्रह: धीरे-धीरे लुप्त हो गया दिवस-उजाला
»  जार्ज़िया के गिरी-टीलों को रात्रि-तिमिर ने घेरा है

जार्जिया के गिरी-टीलों को रात्रि-तिमिर ने घेरा है
औ’ अरागवा नदी सामने कल-छल शोर मचाती है,
बेशक दुख में डूबा-डूबा, पर हल्का मन मेरा है
क्योंकि तुम्हारी याद उदासी लाती, मन तड़पाती है।
एक तुम्हारे, सिर्फ़ तुम्हारे कारण व्यथा उदासी है
और न कोई पीड़ा मुझको, चिन्ता नहीं सताती है,
फिर से मेरी तप्त आत्मा पुनः प्यार की प्यासी है
क्योंकि प्यार के बिना रह सके, हाय, न यह कर पाती है।


रचनाकाल : 1829