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जितना मख़ौल आज मेरी ज़िन्दगी को है / पुष्पराज यादव

जितना मख़ौल आज मेरी ज़िन्दगी को है
शायद ही इस ज़माने में होता किसी को है

आगे का कुछ पता नहीं इस वक़्त तो उन्हें
इतनी है रस्म-ओ-राह कि होती किसी को है
 
हमसे तो पूछने का सबब कुछ नहीं तो क्या
जितनी हवस-ए-वस्ल है उतनी उसी को है

दुनिया बहुत अजीब है इंसाँ को क्या कहें
होता किसी का और वह रोता किसी को है

कितना भी सख़्तजान हो इंसान फिर भी दोस्त!
घर छूटने का दर्द अखरता सभी को है