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जो ख़ुद टूटा हुआ तारा है उससे क्या माँगू / कबीर शुक्ला

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जो खुद टूटा हुआ तारा है उस से क्या माँगू।
उसे मरहम दूँ या मैं अपने दर्द की दवा माँगू।

जो है शबे-फिराक में इधर-उधर भटक रहा,
उसका हमसफ़र बनूँ या उस्से रहनुमा माँगू।

त' अज्जुब हूँ गुबारे-हस्ती-ए-फानी देखकर,
उसके लिए दुआ माँगू या उससे दुआ माँगू।

जिसकी ज़िन्दगी तारीक में सिमट रही हो,
उसको चराग दूँ या फिर उससे ज़िया माँगू।

इतना भी खुद-परस्त ग़ाफिल नहीं है 'कबीर' ,
आबे-तल्ख़ कर अनदेखा खुशी का दरिया माँगू।