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जौहर / श्यामनारायण पाण्डेय / आखेट / पृष्ठ १

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दोपहरी थी, ताप बढ़ा था,
पूर्वजन्म का पाप बढ़ा था।
जल – थल – नभ के शिर पर मानो,
दुर्वासा का शाप चढ़ा था॥

वृत्त-बिन्दु-सा भासमान था,
तप्त तवे सा आसमान था।
दोपहरी के प्रखर ताप में,
जलता जग दावा – समान था॥

स्वयं ताप से विकल भानु था,
किसी तरह किरणें जीती थीं।
उतर उतरकर अम्बर - तल से
सर – सरिता में जल पीती थीं॥

ऊपर नभ से आग बरसती,
नीचे भू पर आग धधकती।
दिगदिगंत से आग निकलती,
लू - लपटों से आग भभकती॥

पंखों में खग बाल छिपाए,
छिपे अधमरे से खोतों में।
खोज खोज जल हार गए, पर
मिला न सीपी भर सोतों में॥

बैठे मृगजल हेर कहीं पर,
तृषित हरिण तरु घेर कहीं पर।
जीभ निकाल चीड़ - छाया में,
हाँफ रहे थे शेर कहीं पर॥

धूल – कणों से पाट रहे थे,
अंबर - तल विकराल बवंडर।
तृषित पथिक के लिए बने थे,
ऊसर – पथ के काल बवंडर॥

तपी रेह से भर देते थे,
जग की आँखें क्रुद्ध बवंडर।
पथ में कहीं पड़े तरुवर तो
कर लेते थे युद्ध बवंडर॥

मूर्छित मृगछौने, सुरही के
लैरू कुम्हला गए कहीं थे।
कहीं सूखते पेड़ पुराने,
सूख गए तरु नए कहीं थे॥

दिनकर – कर में आग लगी थी,
सरिता – सर में आग लगी थी।
जग में हाहाकार मचा था,
बाहर घर में आग लगी थी॥

दोपहरी में जब कि ताप से
सारा जग था दुःख झेलता।
अरावली के घोर विपिन में
एक वीर आखेट खेलता॥

स्वेद – बिंदु उसके ललाट पर
मोती – कण से झलक रहे थे।
वाजि पसीने से तर था, तन
से जल के कण छलक रहे थे॥

गमन - वेग से काँप रहा था,
वाजि निरंतर हाँफ रहा था।
पर सवार पीछे शिकार के,
बारबार पथ नाप रहा था॥

आग – सदृश तपती उसकी असि,
गरमी से भी अधिक गरम थी।
चोट भयंकर करती, पर वह
किसलय से भी अधिक नरम थी॥

लचकीली थी, लचक लचककर
नर्तन पर नर्तन करती थी।
चीर चीरकर वीर पंक्ति वह
पद-कर-तन-कर्तन करती थी॥

पीछे प्यासे मृग - दम्पति के,
वही पड़ी तलवार दुधारी।
गिरती हय की टाप शिला पर,
उड़ उड़ जाती थी चिनगारी॥

चपल चौकड़ी भर भरकर वह
उड़ता कस्तूरी – मृग - जोड़ा।
रतनसिंह ने उसके पीछे
छोड़ दिया था अपना घोड़ा॥

कभी झाड़ियों में छिप जाते,
कभी लताओं के झुरमुट में,
कभी पहाड़ों की दरियों में,
कभी समा जाते खुर – पुट में॥

कभी शिखर पर कुलाँचते थे,
कभी रेंगते पथ महान पर।
कभी सामने ही व्याकुल से,
कभी उड़े तो आसमान पर॥

मृग – दंपति पर रतन – लक्ष्य पर,
इधर उधर वन - जीव भागते।
शेर - तेंदुए - बाघ - रीछ सब
वन वन विकल अतीव भागते॥