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तुझसे जुदा हो जाना उलझन जैसा है / सूफ़ी सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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तुझसे जुदा हो जाना उलझन जैसा है ।
ये ख़याल भी अब तो दुश्मन जैसा है ।

साथ चलूँ तो लगे बुजुर्गों जैसा तू,
मुड़कर मैं देखूँ तो बचपन जैसा है ।

साँसों में ’दिन-रात’ महकते रहते हैं,
कोई तो है जो मुझमें चन्दन जैसा है ।

दिन तो लगता है जैसे क़व्वाली हो,
रात में तेरा नाम कीर्तन जैसा है ।

करे अगर महसूस तो हर अहसास मेरा,
महलों में मिट्टी के आँगन जैसा है ।

झुलसे हुए बदन और जलते मौसम में,
मुझमें तेरा होना सावन जैसा है ।

आकर जबसे तूने पहना है मुझको,
बदन मेरा बस किसी पैरहन[1] जैसा है ।

शब्दार्थ
  1. कपड़े