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तुम ही ऐसा कर सकते हो / वाज़दा ख़ान

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मेरे भीतर उगी सच्चाइयों की कुछ गहरी
रंगतों को तुम चुरा लो और
मैं तुम्हारा वक़्त
मैरी नज़्मों को तुम चांद के भीतर रख दो
तुम ही ऐसा कर सकते हो
तुम्हारी उंगलियों में भी न जाने कितनी
नज़्में क़ैद हैं रिहा होने की छटपटाती
तुम ही ऐसा कर सकते हो
अपने अहम के साथ रहते हुये भी
मेरे अनजाने अजन्में कितने रुपाकारों को
अपने भीतर संजोये तुम
अनियन्त्रित कठिन होते दिन रात में
अन्तर्विरोध से तपते दहलते घबराते
कीच मिट्टी सर्द में घुलते सपने
कई बार याद दिलाते हैं मुझे
आधे अधूरे वज़ूद आकारों के कि
अमूर्तन भी एक हिस्सा है
बातों का वादों का.