भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
दिन गुज़रते गये, रात होती रही / गुलाब खंडेलवाल
Kavita Kosh से
दिन गुज़रते गये, रात होती रही
ज़िन्दगी ख़ुद-ब-ख़ुद मात होती रही
प्यार की कोई ख़ुशियाँ मनाता रहा
और आँखों से बरसात होती रही
हम ग़ज़ल में उसीको उतारा किये
टीस-सी दिल में जो, रात, होती रही
हमने देखी न उनकी झलक आजतक
और हरदम मुलाक़ात होती रही
लाख थी बोलने की मनाही, गुलाब!
भेंट फिर भी ये सौग़ात होती रही