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द्वारिका में, प्रभु! सुख से सोते / गुलाब खंडेलवाल


द्वारिका में, प्रभु! सुख से सोते
और आपके प्रिय व्रजवासी, नाथ! रात-दिन रोते

गायों के मुख म्लान हुए हैं
हाट-बाट वीरान हुए हैं
वे मधुकुंज मसान हुए है
जहाँ रास थे होते

ग्वाल-बाल दर्शन को तरसे
जसुमति नहीं निकलती घर से
बाबा नन्द बने पत्थर से
खाते दुःख में गोते

और बात अपनी क्या बोलूँ!
शर से बिँधी मृगी-सी डोलूँ
गीता जभी आपकी खोलूँ
आँसू पृष्ठ भिगोते

द्वारिका में, प्रभु! सुख से सोते
और आपके प्रिय व्रजवासी, नाथ! रात-दिन रोते