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निकल आए किधर हम बेख़ुदी में / कुमार अनिल

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निकल आये किधर हम बेखुदी में
यहाँ तो है अँधेरा रौशनी में

न मेरी आँख क़ी खुश्की पे जाओ
कोई तूफां छुपा है खामुशी में

तुम्हारी याद ने ऐसा भिगोया
नहा जैसे लिया मैं चाँदनी में

किसे आवाज दूं किसको पुकारूँ
नहीं है दूर तक कोई गली में

छतों को कैसे दीवारें संभालें
यहाँ कमजोरियां हैं नीव ही में

'अनिल' तुमको भला क्या हो गया है
मजा आने लगा आवारगी में