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परवासी, आ जाओ घर / रवीन्द्रनाथ ठाकुर

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परवासी, चले एसो घरे

परवासी, आ जाओ घर
नैय्या को मोड़ लो इधर ।।
देखो तो कितनी ही बार
नौका है नाविक की हुई आर-पार ।।
मांझी के गीत उठे अंबर पुकार ।
गगन गगन आयोजन
पवन पवन आमंत्रण ।।
मिला नहीं उत्तर पर,
मन ने हैं खोले ना द्वार ।।
हुए तभी गृहत्यागी,
निर्वासित कर डाले अंतर-बाहर ।।


मूल बांगला से अनुवाद : प्रयाग शुक्ल

('गीत पंचशती' में 'विचित्र' के अन्तर्गत 49 वीं गीत-संख्या के रूप में संकलित)