Last modified on 13 सितम्बर 2011, at 21:06

प्यार तुम्हारा रिक्त भर रहा मेरा हर पल / विजेन्द्र

प्यार तुम्हारा रिक्त भर रहा मेरा हर पल
यद्यपि नहीं पता है तुमको जैसे जड़ का
हर रेशा कण-कण से ले लेता, भोजन, हल-
चल कभी न होती, वृक्ष खड़ा रहता तड़का

हो चाहे कितना ही, बिना कहे कुछ, द्दाने
भर जाते हैम, पौधा होता है नत, अजब
खेल है सृष्टि का जितना भी दे दे, पाने
को कभी नहीम याचना कोई, हम गजब

माने अपने को आप्लावित कितना ही,
सूखी नदी पड़ी दिखाई हर दम, पाट है
खाली, बिना नेह के उड़ता रेता ही
कई दिनों तक भारी, लगता निरा खार है

जैसे बंजर भूमि, फिर भी कहीं दिपा उर्वर है
मुझे लगा सदा घनी छाँव का तरुवर है।