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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / त्रयोदश सर्ग / पृष्ठ - ४

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बड़ा-बली उन्नत-काय-बैल भी।
विलोक होता उसको विपन्न सा।
नितान्त-उत्पीड़न-दंशनादि से।
न त्राण पाता सुरभी-समूह था॥61॥

पराक्रमी वीर बलिष्ठ-गोप भी।
न सामना थे करते तुरंग का।
वरंच वे थे बने विमूढ़ से।
उसे कहीं देख भयाभिभूत हो॥62॥

समुच्च-शाखा पर वृक्ष की किसी।
तुरन्त जाते चढ़ थे स-व्यग्रता।
सुने कठोरा-ध्वनि अश्व-टाप की।
समस्त-आभीर अतीव-भीत हो॥63॥

मनुष्य आ सम्मुख स्वीय-प्राण को।
बचा नहीं था सकता प्रयत्न से।
दुरन्तता थी उसकी भयावनी।
विमूढ़कारी रव था तुरंग का॥64॥

मुकुन्द ने एक विशाल-दण्ड ले।
स-दर्प घेरा यक बार बाजि को।
अनन्तराघात अजस्र से उसे।
प्रदान की वांछित प्राण-हीनता॥65॥

विलोक ऐसी बलवीर-वीरता।
अशंकता साहस कार्य्य-दक्षता।
समस्त-आभीर विमुग्ध हो गये।
चमत्कृता हो जन-मण्डली उठी॥66॥

वनस्थली कण्टक रूप अन्य भी।
कई बड़े-क्रूर बलिष्ठ-जन्तु थे।
हटा उन्हें भी जिन कौशलादि से।
किया उन्होंने उसको अकण्टका॥67॥

बड़ा-बली-बालिश व्योम नाम का।
वनस्थली में पशु-पाल एक था।
अपार होता उसको विनोद था।
बना महा-पीड़ित प्राणि-पुंज को॥68॥

प्रवंचना से उसको प्रवंचिता।
विशेष होती ब्रज की वसुंधरा।
अनेक-उत्पात पवित्र-भूमि में।
सदा मचाता यह दुष्ट-व्यक्ति था॥69॥

कभी चुराता वृष-वत्स-धेनू था।
कभी उन्हें था जल-बीच बोरता।
प्रहार-द्वारा गुरु-यष्टि के कभी।
उन्हें बनाता वह अंग-हीन था॥70॥

दुरात्मता थी उसकी भयंकरी।
न खेद होता उसको कदापि था।
निरीह गो-वत्स-समूह को जला।
वृथा लगा पावक कुंज-पुंज में॥71॥

अबोध-सीधे बहु-गोप-बाल को।
अनेक देता वन-मध्य कष्ट था।
कभी-कभी था वह डालता उन्हें।
डरावनी मेरु-गुहा समूह में॥72॥

विदार देता शिर था प्रहार से।
कँपा कलेजा दृग फोड़ डालता।
कभी दिखा दानव सी दुरन्तता।
निकाल लेता बहु-मूल्य-प्राण था॥73॥

प्रयत्न नाना ब्रज-देव ने किये।
सुधार चेष्टा हित-दृष्टि साथ की।
परन्तु छूटी उसकी न दुष्टता।
न दूर कोई कु-प्रवृत्ति हो सकी॥74॥

विशुध्द होती, सु-प्रयत्न से नहीं।
प्रभूत-शिक्षा उपदेश आदि से।
प्रभाव-द्वारा बहु-पूर्व पाप के।
मनुष्य-आत्मा स-विशेष दूषिता॥75॥

निपीड़िता देख स्व-जन्मभूमि को।
अतीव उत्पीड़न से खलेन्द्र के।
समीप आता लख एकदा उसे।
स-क्रोध बोले बलभद्र-बन्धु यों॥76॥

सुधार-चेष्टा बहु-व्यर्थ हो गई।
न त्याग तूने कु-प्रवृत्ति को किया।
अत: यही है अब युक्ति उत्तम।
तुझे वधूँ मैं भव-श्रेय-दृष्टि से॥77॥

अवश्य हिंसा अति-निंद्य-कर्म है।
तथापि कर्तव्य-प्रधान है यही।
न सद्म हो पूरित सर्प आदि से।
वसुंधरा में पनपें न पातकी॥78॥

मनुष्य क्या एक पिपीलिका कभी।
न वध्य है जो न अश्रेय हेतु हो।
न पाप है किंच पुनीत-कार्य्य है।
पिशाच-कर्म्मी-नर की वध-क्रिया॥79॥

समाज-उत्पीड़क धर्म्म-विप्लवी।
स्व-जाति का शत्रु दुरन्त पातकी।
मनुष्य-द्रोही भव-प्राणि-पुंज का।
न है क्षमा-योग्य वरंच वध्य है॥80॥