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प्रिय प्रवास / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ / द्वितीय सर्ग / पृष्ठ - ३

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प्रकृति थी जब यों कुपिता महा।
हरि अदृश्य अचानक हो गए।
सदन में जिस से ब्रज-भूप के।
अति-भयानक-क्रंदन हो उठा॥४१॥
सकल-गोकुल था यक तो दुखी।
प्रबल – वेग प्रभंजन – आदि से।
अब दशा सुन नंद-निकेत की।
पवि-समाहत सा वह हो गया॥४२॥
पर व्यतीत हुए द्विघटी टली।
यह तृणावरतीय विडंबना।
पवन – वेग रुका तम भी हटा।
जलद – जाल तिरोहित हो गया॥४३॥
प्रकृति शांत हुई वर व्योम में।
चमकने रवि की किरणें लगीं।
निकट ही निज सुंदर सद्म के।
किलकते हँसते हरि भी मिले॥४४॥
अति पुरातन पुण्य ब्रजेश का।
उदय था इस काल स्वयं हुआ।
पतित हो खर वायु - प्रकोप में।
कुसुम-कोमल बालक जो बचा॥४५॥
शकट - पात ब्रजाधिप पास ही।
पतन अर्जुन से तरु राज का।
पकड़ना कुलिशोषम चंचु से।
खल बकासुर का बलवीर को॥४६॥
वधन – उद्यम दुर्जय – वत्स का।
कुटिलता अघ संज्ञक - सर्प की।
विकट घोटक की अपकारिता।
हरि निपातन यत्न अरिष्ट का॥४७॥
कपट – रूप – प्रलंब प्रवंचना।
खलपना - पशुपालक - व्योम का।
अहह ए सब घोर अनर्थ थे।
ब्रज – विभूषण हैं जिनसे बचे॥४८॥
पर दुरंत - नराधिप कंस ने।
अब कुचक्र भयंकर है रचा।
युगल बालक संग ब्रजेश जो।
कल निमंत्रित हैं मख में हुए॥४९॥
गमन जो न करें बनती नहीं।
गमन से सब भाँति विपत्ति है।
जटिलता इस कौशल जाल की।
अहह है अति कष्ट प्रदायिनी॥५०॥
प्रणतपाल कृपानिधि श्रीपते।
फलद है प्रभु का पद-पद्म ही।
दुख-पयोनिधि मज्जित का वही।
जगत में परमोत्तम पोत है॥५१॥
विषम संकट में ब्रज है पड़ा।
पर हमें अवलंबन है वही।
निबिड़ पामरता, तम हो चला।
पर प्रभो बल है नख-ज्योति का॥५२॥
विपद ज्यों बहुधा कितनी टली।
प्रभु कृपाबल त्यों यह भी टले।
दुखित मानस का करुणानिधे।
अति विनीत निवेदन है यही॥५३॥
ब्रज-विभाकर ही अवलंब हैं।
हम सशंकित प्राणि-समूह के।
यदि हुआ कुछ भी प्रतिकूल तो।
ब्रज-धरा तमसावृत हो चुकी॥५४॥
पुरुष यों करते अनुताप थे।
अधिक थीं व्यथिता ब्रज-नारियाँ।
बन अपार – विषाद - उपेत वे।
बिलख थीं दृग वारि विमोचतीं॥५५॥
दुख प्रकाशन का क्रम नारि का।
अधिक था नर के अनुसार ही।
पर विलाप कलाप बिसूरना।
बिलखना उनमें अतिरिक्त था॥५६॥
ब्रज-धरा-जन की निशि साथ ही।
विकलता परिवर्द्धित हो चली।
तिमिर साथ विमोहक शोक भी।
प्रबल था पल ही पल रो रहा॥५७॥
विशद - गोकुल बीच विषाद की।
अति - असंयत जो लहरें उठीं।
बहु विवर्द्धित हो निशि–मध्य ही।
ब्रज - धरातलव्यापित वे हुईं॥५८॥
विलसती अब थी न प्रफुल्लता।
न वह हास विलास विनोद था।
हृदय कंपित थी करती महा।
दुखमयी ब्रज-भूमि – विभीषिका॥५९॥
तिमिर था घिरता बहु नित्य ही।
पर घिरा तम जो निशि आज की।
उस विषाद - महातम से कभी।
रहित हो न सकी ब्रज की धरा॥६०॥
बहु - भयंकर थी यह यामिनी।
बिलपते ब्रज भूतल के लिए।
तिमिर में जिसके उसका शशी।
बहु-कला युत होकर खो चला॥६१॥
घहरती घिरती दुख की घटा।
यह अचानक जो निशि में उठी।
वह ब्रजांगण में चिर काल ही।
बरसती बन लोचनवारि थी॥६२॥
ब्रज – धरा-जन के उर मध्य जो।
विरह – जात लगी यह कालिमा।
तनिक धो न सका उस को कभी।
नयन का बहु-वारि – प्रवाह भी॥६३॥
सुखद थे बहु जो जन के लिए।
फिर नहीं ब्रज के दिन वे फिरे।
मलिनता न समुज्वलता हुई।
दुख-निशा न हुई सुख की निशा॥६४॥