उसकी समझ में
नहीं आती मेरी बातें
फिर भी
उसी से बतियाता रहता हूँ
दिन-रात।
बतियाता रहता हूँ
शायद पकड़ में आ जाए उसकी
मेरी कोई बात,
उसकी कोई बात
समझ में आ जाए मेरी।
उसकी हँसी और उसकी उदासी
यही नहीं होंगी उस दिन
जिस दिन
समझ लेंगे हम
एक-दूसरे की बातें।
रचनाकाल : 1992, मसोढ़ा